राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
मैनपाट, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
सच्चा मोक्ष
(कहानी)
गंगा किनारे की शांत कुटिया में स्वामी अद्वैतानंद पिछले बीस वर्षों से कठिन तपस्या कर रहे थे। उनका एकमात्र लक्ष्य था मोक्ष की प्राप्ति, जन्म-मरण के इस चक्र से हमेशा के लिए मुक्ति चाहते थे। वे दिन-रात आंखें मूंदकर ध्यान में लीन रहते, संसार की हर हलचल से दूर उन्हें लगता था कि समाज के प्रपंचों से अलग होकर ही आत्मा को परमात्मा में विलीन किया जा सकता है।
उसी गांव में एक युवक माधव रहता जिसने न तो कोई कंदरा देखी थी और न ही कभी वेदों का गंभीर पाठ किया था। लेकिन उसके दिन की शुरुआत गांव के बीमार, बुजुर्गों और भूखों की सेवा से होती थी। जब भी गांव में कोई विपदा आती, माधव अपनी परवाह किए बिना सबसे आगे खड़ा मिलता।
एक बार पूरे क्षेत्र में भयानक अकाल पड़ा, नदियां सूख गईं, फसलें बर्बाद हो गईं और गांव में भुखमरी फैल गई। लोग दाने-दाने को तरसने लगे क्योंकि महामारी ने भी पैर पसार लिए थे। कुटिया के बाहर तड़पते लोगों की चीखें स्वामी अद्वैतानंद के ध्यान में बाधा डालने लगीं।
स्वामी जी ने अपनी आंखें खोलीं और कुटिया से बाहर आए, उन्होंने देखा कि माधव अपनी पीठ पर अनाज के बोरे ढो रहा है, बीमारों को दवाइयां बांट रहा है और रोते हुए बच्चों को सांत्वना दे रहा है। माधव के चेहरे पर गहरी थकान थी लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक और शांति थी।
स्वामी जी ने माधव को रोका और पूछा, “माधव, तुम इस सांसारिक भागदौड़ में अपनी ऊर्जा क्यों नष्ट कर रहे हो? यह संसार तो नश्वर है, एक भ्रम है। तुम्हें अपनी आत्मा के कल्याण और मोक्ष के लिए प्रभु की आराधना करनी चाहिए। इस सांसारिक मोह में पड़कर तुम खुद को जनम-मरण के बंधन में ही बांध रहे हो?
माधव ने विनम्रतापूर्वक अपने सिर से अनाज का बोरा नीचे रखा, स्वामी जी के चरण छुए और शांत स्वर में कहा, “महाराज, मुझे मोक्ष की कोई चाह नहीं है। अगर मैं आंखें बंद करके स्वर्ग के सपने देखूं और मेरे सामने कोई भूख से दम तोड़ दे, तो मेरी वह मुक्ति भी एक स्वार्थ होगी ,व्यक्ति और समाज का कल्याण करना ही मेरी पूजा है। यदि मेरे कर्मों से किसी एक इंसान के जीवन का अंधकार दूर हो सके, तो मैं बार-बार इस धरती पर जन्म लेने को तैयार हूँ।”
माधव की बात सुनकर स्वामी जी स्तब्ध रह गए। उसी रात स्वामी जी ध्यान में बैठे, तो उन्हें भीतर कोई शांति महसूस नहीं हुई। उन्हें बार-बार बाहर तड़पते बच्चों और माधव के निस्वार्थ चेहरे की याद आ रही थी। उन्हें अचानक बोध हुआ कि केवल स्वयं की मुक्ति की कामना करना भी एक प्रकार का अहंकार और स्वार्थ ही है। सच्चा अध्यात्म तो दूसरों के दुखों को हरने में है।
अगली सुबह, स्वामी जी ने अपनी कुटिया छोड़ दी उन्होंने अपने गेरुए वस्त्रों को समेटा और सीधे गांव के उस शिविर में पहुंच गए जहां बीमारों का इलाज चल रहा था। उन्होंने आगे बढ़कर एक असहाय वृद्ध के घावों को साफ करना शुरू कर दिया।
माधव ने जब स्वामी जी को सेवा करते देखा, तो उसकी आंखें भर आईं। स्वामी जी मुस्कुराए और बोले, “माधव, आज मुझे समझ आया कि पत्थरों की मूर्तियों और एकांत की कंदराओं से कहीं अधिक ईश्वर उस पीड़ित मनुष्य में वास करता है। स्वयं के अदृश्य मोक्ष की परिकल्पना से कहीं बेहतर और वास्तविक है धरातल पर रहकर व्यक्ति और समाज का कल्याण करना। आज मुझे सच्ची शांति मिली है।
उस दिन के बाद, स्वामी जी और माधव मिलकर समाज की सेवा में जुट गए। स्वामी जी को अब किसी मोक्ष की तलाश नहीं थी, क्योंकि वे समाज के कल्याण में ही हर दिन ईश्वर का साक्षात्कार कर रहे थे।






