संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मक्का समझौते का भू-राजनीतिक गणित और भारत।
हाल में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच संपन्न ‘मक्का समझौता’ (Makkah Accord) पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के रक्षा समीकरणों में एक नया अध्याय जोड़ता है। प्रथम दृष्टया, यह समझौता तीनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी, सैन्य तकनीक के आदान-प्रदान और सुरक्षा चिंताओं पर साझी रणनीति बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम दिखाई देता है। हालांकि, इसकी वास्तविक प्रभावशीलता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं, खासकर जब इसकी तुलना नाटो जैसे स्थापित और औपचारिक सैन्य गठबंधनों से की जाती है।
किसी भी सैन्य गठबंधन की जमीनी सफलता उसके एकीकृत कमान ढांचे (Joint Command) और स्थायी संयुक्त सेना पर निर्भर करती है। मक्का समझौते में इन दोनों ही बुनियादी तत्वों का पूरी तरह अभाव है। बिना किसी केंद्रीय कमांडर या समर्पित त्वरित प्रतिक्रिया बल के, संकट के समय त्वरित और समन्वित सैन्य कार्रवाई कर पाना इन तीनों देशों के लिए लगभग असंभव होगा। इसके अतिरिक्त, तीनों देशों की सेनाओं के हथियार, तकनीक, प्रशिक्षण और संचालन पद्धतियां एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। इस तकनीकी और रणनीतिक विषमता के कारण युद्ध या आपात स्थिति में अंतर-संचालनीयता (interoperability) हासिल करना बेहद जटिल चुनौती साबित होगा।
पश्चिम एशिया के क्षेत्रीय संतुलन की बात करें तो यह समझौता सीमित प्रभाव ही डाल पाएगा। सऊदी अरब का प्राथमिक ध्यान यमन और ईरान से पैदा होने वाली सुरक्षा चुनौतियों पर है, जबकि तुर्की भूमध्य सागर और सीरिया में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। पाकिस्तान की अपनी आर्थिक लाचारियां और घरेलू समस्याएं हैं। इन तीनों की अपनी-अपनी अलग-अलग भू-राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं, जो इन्हें एक ठोस सैन्य मोर्चे के रूप में एकजुट होने से रोकती हैं। केवल साझा बयानों या द्विपक्षीय अभ्यासों से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ा फेरबदल नहीं आ सकता।
भारत के दृष्टिकोण से इस समझौते का असर मिला-जुला और बहुआयामी रहेगा। तात्कालिक रूप से भारत को इससे अत्यधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भारत के सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा क्षेत्र में बेहद मजबूत और गहरे रणनीतिक संबंध हैं। सऊदी अरब अपनी सुरक्षा और आर्थिक विविधीकरण के लिए भारत जैसे विशाल बाजार को नजरअंदाज नहीं कर सकता। हालांकि, भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय तुर्की और पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य नजदीकी हो सकती है। तुर्की के अत्याधुनिक ड्रोन और रक्षा तकनीक यदि पाकिस्तान तक बिना किसी बाधा के पहुंचते हैं, तो इससे भारत की सीमाओं पर रक्षा संतुलन को थोड़ा झटका लग सकता है। इसलिए भारत को इस त्रिपक्षीय गठजोड़ के सैन्य-तकनीकी आदान-प्रदान पर बारीक नजर रखनी होगी।
वैश्विक राजनीति में इस समझौते का महत्व रक्षा से ज्यादा राजनीतिक संदेश देने का है। यह समझौता दिखाता है कि पारंपरिक अमेरिकी सुरक्षा छत्रछाया से परे जाकर खाड़ी देश अब अपनी सुरक्षा के लिए बहुपक्षीय विकल्प तलाश रहे हैं। तुर्की इसके जरिए मुस्लिम जगत में अपना नेतृत्व का दावा मजबूत करना चाहता है, तो पाकिस्तान अपनी जर्जर अर्थव्यवस्था के बावजूद अपनी सैन्य प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश में है।
निष्कर्षतः, मक्का समझौता नाटो जैसी कोई मजबूत सैन्य दीवार बनने के बजाय केवल एक लचीली राजनीतिक-सैन्य समझ बनकर रह जाने की अधिक संभावना रखता है, जिसका वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव सीमित ही रहेगा।







