सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका एवं शिक्षिका
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छ.ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख
“जीवन को काव्य की तरह कलात्मकता और सौंदर्य से जीना।”
-सुश्री सरोज कंसारी
‘तनावमुक्त होकर परिस्थितियों के साथ सहज बहना व मन को संगीत की तरह शीतल रखना ही जीवन का असली सार होता है।’
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कविता:
”यह जीवन है,
इसे एक नदी की तरह बहने दो।
अपने मन को संगीत बना लो,
जैसे तुम कोई कविता रचते हो।”
ये जीवन एक नदी है, एक किताब है, एक उपन्यास है – न जाने क्या-क्या है ये जिन्दगी। पर इसे जीना चाहिए। शांत मन का होना बहुत ज़रूरी है। शांत मन और खुशहाल जीवन तभी रहता है जब हम उन लोगों और बातों को त्याग दें और भूल जाएं जो हमें काटती हैं, परेशान करती हैं, मन को अशांत करती हैं। भूल जाएंगे तभी जी पाएंगे। अपनों के हृदय में जगह बनाइए और उसे बनाए रखिए। सोशल मीडिया का सहारा मत लीजिए।
मन से मत लड़िए, इसे समझिए और शांत रखिए। मन के अनुसार जीना सबको भाता है, पर सब हमारे मन के मुताबिक नहीं होगा। जब मन जिद कर ले तो बेचैनी हो जाती है। दिल में चाहे खुशी हो या गम, जब तक उसे किसी अपने से न कहें, चैन नहीं आता। जो अपनी वेदना कह देते हैं, वे हर चुनौती झेल जाते हैं, क्योंकि उनके मन में कोई द्वंद्व नहीं होता। दिल-दिमाग में बातें भरकर रखने से हम केवल खुद से ही उलझते रहते हैं। सांसारिक जीवन में रिश्ते-नाते निभाते हुए आगे बढ़िए। उनकी कद्र कीजिए। मानसिक संतुलन रखना सीखिए। सकारात्मक बनकर अपने कर्तव्य पर चलते रहिए। याद रखिए, सबको निभाना आवश्यक नहीं।
मानव ने जीवन को गणित मान लिया है, किंतु जीवन कोई गणित नहीं कि हमारे चिंतन से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर मिल ही जाए। जीवन तो एक नदी है – जो कभी शांत रहती है, तो कभी उफान पर होती है। हम किनारे पर खड़े होकर पानी को समझने में पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं, पर उसमें पैर तक नहीं डुबोते। सुख और दुख दोनों ही इसके अभिन्न अंग हैं, इसलिए जीवन से शिकायत मत कीजिए। जो बीत गया, वह एक पाठ था; और जो आने वाला है, वह हमारी परीक्षा है।
आज जीवनशैली बदल गई है। हमें सदैव दिल से जीना चाहिए। किंतु आज जरा-सी बात पर बहस और घमंड है। हमें जागरूक होकर रहना चाहिए। सबके भले के लिए कार्य और कामना करनी चाहिए। युवा देश की हिम्मत हैं, उन्हें प्रोत्साहित कीजिए। आज सब कुछ है – पैसा, सुविधा, तरक्की। फिर भी अपनों की आंखों में नमी है। उन्हें रोटी-कपड़ा-मकान के साथ 10 मिनट का समय चाहिए, स्टेटस नहीं। हम सब कुछ देकर भी दूर न हों। भावनात्मक आदान-प्रदान बंद नहीं होना चाहिए। हम सोशल मीडिया पर नेकी और अच्छे संदेश बटोरने में लगे रहें, पर जो निकट हैं, उनकी व्यथा न सुन सकें – यह उचित नहीं
ये जिंदगी के हर काम को मजबूरी में नहीं, बल्कि पूरे हृदय व एक कलाकार के शौक के साथ कर लें। हर छोटी-सी चीज़ में खूबसूरती ढूंढ लेना और दुखों में भी मुस्कुराने की कला सीख जाना। बैठकर बात कीजिए, सुनिए, हंसिए-मुस्कुराइए। छोटी बातों को क्षमा कीजिए। जीवन की चुनौतियों में हमारा ध्यान और कर्म ही काम आएंगे। केवल अपने और उनका मार्गदर्शन ही साथ देंगे। किसी को हम कभी आहत न करें – ऐसी कामना रहे।






