आशीष त्रिवेदी
(नया अध्याम, उत्तराखण्ड)
💋 “संविधान और हम”………..
सिर्फ पेपरलेस रजिस्ट्री से व्यवस्था नहीं बदलेगी, रजिस्ट्री व्यवस्था नागरिक-केंद्रित हो।
👉🏿 कागज हटाने से नहीं बदलेगी व्यवस्था, जब तक आम आदमी को दलालों और अनधिकृत मध्यस्थों के चक्र से मुक्ति नहीं मिलेगी
बिहार में जमीन सिर्फ रकबा, खाता और प्लॉट नंबर नहीं है। जमीन किसी व्यक्ति की पीढ़ियों की विरासत है, किसी परिवार की जीवनभर की कमाई है और किसी परिवार के लिए
भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा है। इसलिए जमीन की रजिस्ट्री महज सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन का बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण फैसला है। यही वजह है कि रजिस्ट्री व्यवस्था में पारदर्शिता की जरूरत सबसे अधिक है।
बिहार में पेपरलेस रजिस्ट्री की दिशा में उठाए गए कदम निश्चित रूप से तकनीकी बदलाव का संकेत हैं। लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—
क्या कागज हटने के साथ बिचौलियों की भूमिका भी खत्म हुई? क्या आम नागरिक को हर शुल्क और हर प्रक्रिया की पूरी जानकारी मिल रही है? क्या बिना किसी मध्यस्थ के रजिस्ट्री कराना वास्तव में आसान हुआ है?
अगर इन सवालों का जवाब पूरी तरह ‘हां’ नहीं है, तो डिजिटल व्यवस्था अभी आधे रास्ते में है।
कागज से ज्यादा जरूरी है पारदर्शिता:
सॉफ्टवेयर बदल देना आसान है, व्यवस्था बदलना कठिन। व्यवस्था तब बदलती है, जब नागरिक को पहले से पता हो कि उसे कितना शुल्क देना है, किस दस्तावेज की जरूरत है, किस अधिकारी की क्या भूमिका है, आवेदन किस चरण में है और शिकायत होने पर किसके पास जाना है। हर भुगतान का डिजिटल रिकॉर्ड हो। हर प्रक्रिया की ऑनलाइन जानकारी हो। आवेदन की स्थिति मोबाइल पर दिखाई दे। किसी अतिरिक्त राशि की मांग हो तो उसकी शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था हो और शिकायत पर कार्रवाई भी दिखाई दे।यही डिजिटल शासन की असली कसौटी है।
कातिब व्यवस्था उपयोगी, लेकिन निर्भरता क्यों?:
रजिस्ट्री प्रक्रिया में कातिबों की भूमिका वर्षों से रही है। दस्तावेज तैयार करने और प्रक्रिया में सहायता देने में उनकी उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक आम नागरिक को अपनी ही जमीन की रजिस्ट्री कराने के लिए हर कदम पर किसी मध्यस्थ की जरूरत पड़नी चाहिए?। यदि सरकारी पोर्टल, शुल्क-सूची और डिजिटल प्रक्रिया मौजूद होने के बावजूद नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि उसे क्या करना है और कितना भुगतान करना है, तो डिजिटल व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यहीं उजागर होती है।
डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य नागरिक को सक्षम बनाना है, किसी नए मध्यस्थ पर निर्भर करना नहीं। एक ही जमीन के एक जैसे रकवा के लिए अलग अलग कातिव अलग अलग डिमांड करते है।
वर्तमान में प्रत्येक रजिस्ट्री में हर टेबल की सुविधा शुल्क तय:
वर्तमान रजिस्ट्री व्यवस्था में कई कार्तिवों से मैने सुना है कि हर टेबल पर सुविधा शुल्क के नाम पर खर्च देना पड़ता है। कुरेदने पर कर्तिव भाई बोलते है कि नहीं देंगे तो फाइल फंसा देगा। ये कौन सा सुविधा शुल्क है जिसका कोई रसीद नहीं मिलता है।
रजिस्ट्री कार्यालय में प्रवेश करने वाले नागरिक को एक ऐसी व्यवस्था मिले, जहां शुल्क तय हो, प्रक्रिया स्पष्ट हो, भुगतान डिजिटल हो, आवेदन की ट्रैकिंग हो, दस्तावेज सुरक्षित हों और शिकायत पर जवाबदेही तय हो। किसी नागरिक को यह पूछने की जरूरत न पड़े कि “कितना लगेगा?”, सरकारी सिस्टम खुद बताए—“इतना शुल्क लगेगा।” किसी को यह तलाशने की जरूरत न पड़े कि “काम कहां अटका है?”
सिस्टम खुद बताए—“आपका आवेदन इस चरण में है।” और सबसे महत्वपूर्ण किसी नागरिक को यह महसूस न हो कि जमीन रजिस्ट्री में सरकारी शुल्क के अलावे इतना हजार अधिक रुपया लगा है। साथ ही यह भी महसूस न हो कि काम कराने के लिए किसी खास व्यक्ति की कृपा जरूरी है।
डिजिटल इंडिया का मतलब सिर्फ कंप्यूटर, सर्वर और ऑनलाइन आवेदन नहीं है। असली डिजिटल क्रांति की पहचान है कम मानवीय निर्भरता, अधिक पारदर्शिता और स्पष्ट जवाबदेही। जमीन की रजिस्ट्री जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में यह और भी जरूरी है। क्योंकि यहां एक गलत जानकारी, गलत शुल्क या गलत दस्तावेज किसी परिवार को वर्षों की कानूनी लड़ाई में धकेल सकता है। इसलिए सरकार को तकनीक के साथ-साथ निगरानी और जवाबदेही की तकनीक भी मजबूत करनी होगी।
पेपरलेस रजिस्ट्री अच्छी पहल है। लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि मान लेना जल्दबाजी होगी
कागज हटना सुधार की शुरुआत है। पारदर्शिता उसकी पहचान है और बिचौलियामुक्त व्यवस्था उसकी असली मंजिल। इसमें असली डिजिटल क्रांति उस दिन होगी, जब जमीन की रजिस्ट्री कराने वाला आम नागरिक कार्यालय से बाहर निकले और उसके चेहरे पर यह संतोष हो कि—
“मुझे किसी के सामने झुकना नहीं पड़ा। मुझे हर शुल्क पहले से पता था। मैंने किसी को अनावश्यक पैसा नहीं दिया। और मेरे काम का पूरा हिसाब सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है।” तब कहा जाएगा कि बिहार में सिर्फ पेपरलेस रजिस्ट्री नहीं हुई है बल्कि रजिस्ट्री व्यवस्था सचमुच नागरिक-केंद्रित हुई है।







