पूनम भटनागर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
घर (लघुकथा)
रमेश: बापू, हम कब से इस पुराने घर में रह रहे हैं। देखो ना, सबके घर कितने अच्छे हैं, पर हमारा घर तो बहुत ही पुराना हो गया है। अब तो रात को सोने से भी डर लगता है कि कहीं सर पर छत टूटकर न आ जाए।
बापू: कोई बात नहीं रमेश। आज जो भी मैं कमाता हूँ, मेहनत से सब तेरे भविष्य के लिए लगा रहा हूँ, ताकि तुझे मेरी तरह मजदूरी न करनी पड़े। कल जब तुम पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करोगे, तो ये घर तुम ठीक करना। अभी तो तुमको बहुत पढ़ना है।
रमेश: जी बापू। जब भी मुझे नौकरी मिलेगी, मैं सबसे पहले अपना घर ठीक करवाऊँगा।
फिर कुछ समय बाद रमेश शहर चला गया। उसे घर की कोई याद नहीं आई। बस वह अपने बापू के लिए मनीआर्डर भेजता था।
अब तो शहर में उसे अपना घर लेना था। उसके बापू भी शायद समझ गए थे कि अब रमेश वापस नहीं आएगा। रमेश अब वह छोटा बच्चा नहीं रहा था। अब वह शहर का बाबू बन गया था।







