बच्चों को सजा नहीं, संवेदना चाहिए

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मनोज कुमार अग्रवाल

                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

बच्चों को सजा नहीं, संवेदना चाहिए

 

 

 

 वह स्कूल में मेरा पहला दिन था, जब मेरे अध्यापक ने थप्पड़ लगाकर मेरा गाल लाल कर दिया था। उस समय मेरी आयु मात्र चार साल की रही होगी, लेकिन उस थप्पड़ की झनझनाहट मेरे मन-मस्तिष्क और स्मृति में 56 साल बीत जाने के बाद भी ताजा है। भारत में स्कूलों में शिक्षकों द्वारा बच्चों की पिटाई और शारीरिक दंड एक गंभीर और गैर-कानूनी समस्या है, जिस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी वैश्विक संस्थाएं भी चिंता जता चुकी हैं। हाल ही में ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें शिक्षकों की अमानवीयता और निर्दयता भरी पिटाई के कारण मासूम बच्चों की मौत हो गई अथवा वे गंभीर रूप से घायल हो गए।

        हाल ही में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के लिटिल गार्डन स्कूल में 20 अगस्त 2026 को होमवर्क पूरा न करने पर 6 साल के छात्र प्रणय तेजा की टीचर की कथित पिटाई और थप्पड़ मारने के बाद क्लासरूम में गिरकर मौत हो गई। दरअसल, बच्चे ने होमवर्क पूरा नहीं किया था, जिसके बाद टीचर ने उसे डांटा और थप्पड़ मारा। क्लासरूम में लगे सीसीटीवी फुटेज में सामने आया कि थप्पड़ मारने और प्रताड़ित करने के कुछ ही पलों बाद बच्चा बेहोश होकर गिर पड़ा। बच्चे को तुरंत किंग जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। परिवार का आरोप है कि डर और दहशत की वजह से उसे हार्ट अटैक आया।

       आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम की इस घटना से संबद्ध वीडियो पूरे देश में वायरल हुआ, जिसमें एक प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका बच्चे को डांटती और थप्पड़ मारती नजर आ रही थी। उसके बाद बच्चे को कटे पेड़ की तरह गिरते देखा गया। बताया जाता है कि होमवर्क पूरा न करने पर टीचर ने एलकेजी के छह वर्षीय छात्र प्रणय तेजा को पहले बुरी तरह डांटा और फिर उसे जोर से थप्पड़ मारा, जो उसे एक शॉक की तरह लगा। सीसीटीवी कैमरे की पुलिस द्वारा हासिल रिकॉर्डिंग में बच्चे की पिटाई और जमीन पर गिरने का दृश्य स्पष्ट दिखाई दे रहा था। बच्चे को अस्पताल ले जाया गया, जहां बताया गया कि उसकी मृत्यु हो चुकी है। इस घटना के बाद व्यापक विरोध प्रदर्शन भी हुए। अभिभावकों का आरोप है कि बच्चा घर से स्वस्थ स्थिति में स्कूल के लिए निकला था। उसे कोई रोग भी नहीं था। बाकायदा उसने स्कूल जाने की खुद जिद की थी। उसके पिता के अनुसार, उनका परिवार एक तीर्थयात्रा पर गया था, जिसकी वजह से वह होमवर्क नहीं कर सका। इसके बाद टीचर के खिलाफ कार्रवाई और निजी स्कूलों में छात्रों की सुरक्षा बढ़ाने तथा संवेदनशील व्यवहार की मांग तेज हुई। वहीं दूसरी ओर स्कूल प्रशासन ने दलील दी कि खेल के मैदान में गिरने की वजह से बच्चे की जान गई, जबकि बताया जाता है कि स्कूल में कोई खेल का मैदान था ही नहीं।

        पूरी दुनिया में ऐसे तमाम अध्ययन व शोध निष्कर्ष सामने आ चुके हैं कि स्कूली बच्चों का किसी भी तरह शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न नहीं किया जाना चाहिए। यह न केवल शिक्षकों का शैक्षिक दायित्व है, बल्कि वे इसके लिए कानूनी रूप से भी बाध्य हैं। लेकिन विडंबना यह है कि शिक्षकों ने जाने क्यों मान लिया है कि किसी छात्र की गलती को दंडित या प्रताड़ित करके ही सुधारा जा सकता है। कहीं न कहीं यह शिक्षकों में धैर्य व तार्किक सोच की कमी को भी दर्शाता है।

        राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी पिछले दिनों ऐसी ही घटना सामने आई। वहां विनोद नगर में एक सरकारी स्कूल की ग्यारह साल की छात्रा की सजा दिए जाने के बाद मौत हो गई। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह क्लास में किताब लाना भूल गई। शिक्षिका ने उसे क्लास के पीछे हाथ ऊपर करके खड़े होने की सजा दी। कक्षा में इस तरह काफी देर तक खड़े रहने और अपमान से आहत होने के बाद उसकी तबीयत खराब हो गई। उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन बाद में उसकी मौत हो गई।

              मौजपुर-जाफराबाद, दिल्ली में एक प्ले स्कूल में 3 साल के मासूम बच्चे को एप्रन की डोरी से 3 घंटे तक कुर्सी से बांधकर बेरहमी से पीटा गया, थप्पड़ मारे गए और कान खींचे गए, जिससे बच्चे के कान के पर्दे सूज गए।

       अमरोहा में हाल ही में दसवीं कक्षा के एक छात्र को स्कूल यूनिफॉर्म न पहनने और बेंच न उठाने पर शिक्षक ने डंडे से बेरहमी से पीटा।

     इसी तरह की एक अन्य घटना में फरीदाबाद के एक स्कूल में मामूली बात पर छात्रा को चार घंटे खड़े होने की सजा दी गई। घटना से आहत व अपमानित महसूस करके छात्रा ने स्कूल की छत से कूदकर जान दे दी।

            जालौन, उत्तर प्रदेश में तीसरी कक्षा के 8 वर्षीय बच्चे को शिक्षक ने बेरहमी से पीटने के बाद दो घंटे तक बाथरूम में बंद रखा।

         मध्य प्रदेश के एक पब्लिक स्कूल में मामूली कहासुनी के बाद प्रिंसिपल ने 8वीं कक्षा के छात्र को लात-घूंसों से पीटा और जमीन पर लिटाकर बेरहमी से प्रताड़ित किया।

           विचारणीय प्रश्न है कि प्रशिक्षित शिक्षक इस बात को समझने का प्रयास क्यों नहीं करते कि उन्हें छात्रों के साथ संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए। वे क्यों नहीं समझते कि क्लास में सबके सामने दंडित किए जाने से बच्चे के कोमल मन-मस्तिष्क पर कैसा नकारात्मक असर पड़ेगा। शीर्ष अदालत ने सभी स्कूलों के शिक्षकों के लिए इस बाबत दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से दे रखे हैं, लेकिन इसके बावजूद अप्रिय घटनाएं हो रही हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कई शिक्षक इन कानूनी व नैतिक मापदंडों को ताक पर रखकर बच्चों को प्रताड़ित करते हैं। निस्संदेह, कोई भी शैक्षिक व्यवस्था किसी भी शिक्षक को निरंकुश व्यवहार करने और अपनी भड़ास निकालने की इजाजत नहीं देती। दरअसल, समय के साथ-साथ बच्चों में ऐसे भाव विकसित हो गए हैं कि वे कक्षा में सार्वजनिक रूप से अपमान व प्रताड़ना बर्दाश्त नहीं करते। समाज में एकल परिवार परंपरा के प्रचलन के बाद बच्चे अभिभावकों के ध्यान के केंद्र में आ गए हैं। संयुक्त परिवारों में बच्चे मान-अपमान के प्रति इतने ज्यादा संवेदनशील नहीं होते थे। लेकिन आज घर में अकेले होने के नाते मिलने वाले विशिष्ट व्यवहार की अपेक्षा बच्चा स्कूल में भी करता है। फलतः किसी दंड या ताड़ना को वह बेहद गंभीरता से लेता है।

       हमारे देश में कानूनन शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 17 के तहत भी स्कूलों में किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न पूरी तरह प्रतिबंधित है और यह एक दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं बच्चों के विकास और शिक्षा व्यवस्था के काले चेहरे को उजागर करती हैं।

           बच्चों पर हाथ उठाने वाले शिक्षकों पर भारतीय न्याय संहिता / भारतीय दंड संहिता और किशोर न्याय अधिनियम के तहत कानूनी और फौजदारी कार्रवाई की जा सकती है। घटना की तुरंत स्थानीय पुलिस थाने में लिखित शिकायत या एफआईआर दर्ज कराई जानी चाहिए। ऐसी घटनाओं की शिकायत राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग या चाइल्डलाइन (नंबर 1098) पर की जा सकती है। शिक्षा बोर्ड के नियमों के अनुसार स्कूल प्रशासन को भी आरोपी शिक्षक के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई करनी चाहिए।

                         (विनायक फीचर्स)

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