राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
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सर्प भी छोड़ते हैं कैंचुल.
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टुकड़ा-टुकड़ा दर्पण हूँ, साफ हूँ मैं
नहीं हूँ गुनहगार कहीं भी, खुद इंसाफ हूँ मैं
खुद ही वकील हूँ, खुद ही दलील हूँ मैं
सच को झूठ कभी भी मैं कहता नहीं हूँ
झूठ का सच कभी भी मैं करता नहीं हूँ
जो आँखें मिलाकर करता है बात मुझसे
मैं भी मिलाकर आँखें बात करता हूँ उससे
चोर है वो जो चुराता रहता है नजरें
बिछाता हूँ घरों में बारूद पाने को नोबेल
मर्जी से लगाता हूँ, हटाता हूँ नाकेबंदी
नाक कटवाकर भी होता रहता हूँ खुश
बशर्मी से, बेशर्मी का मनाता हूँ बेहूदा जश्न
लगाकर आग, बेचता हूँ बोतलें पानी की
झगड़ता हूँ हर कहीं, करवाता हूँ झगड़े भी
अकारण ही बन बैठता हूँ मंच-पंच-प्रधान
नाचने-गाने लगता हूँ लाशों के ढेर पर
शाकाहारी होने का भरता हूँ स्वाँग
मानव-रक्त में डुबोकर खाता हूँ डबलरोटी
नोचता हूँ बोटी, फेंकता हूँ पालतू कुत्तों को
मानवीयता से ढेरों फालतू हूँ, बेचारा हूँ मैं
अपने ही लोगों से खारिज भी कितना
चेहरा अपना धो नहीं पाता हूँ सुबह-शाम
हारता हूँ, बार-बार बदलते हुए मोहरे
देखता ही रहता हूँ सिर्फ रातें अंधेरोंभरी
किसी की बपौती नहीं है आकाश में चाँद
आत्ममुग्धता की भी होती हैं सीमाएँ
सर्प भी छोड़ते हैं कैंचुल.
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दु:ख से बाहर.
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दु:ख हैं, दर्द हैं, दर्ज हैं कविताओं में
तफसीलों, खुलासों में समाते नहीं हैं वे
करता हूँ कोशिशें हँसते-हँसते कहने की
कुछ कह पाता हूँ, कुछ कह नहीं पाता हूँ
सोचता रहता हूँ वह प्रेम, वह रोशनी
जिसका कद मिलता था नीले आकाश से
नीला आकाश तो देखा था कई-कई बार
नीली आँखें देखी थीं पहली-पहली बार
तैरती नावें तो देखी थीं मैंने कई-कई बार
तैरती रोशनी देखी थी पहली-पहली बार
शायद वही था दु;ख, दर्द का अनुवाद
एक वृक्ष से बन जाती हैं माचिसें हजारों
हजारों माचिसों से बनता नहीं है एक वृक्ष
एक तीली बहुत है मगर जँगल विरूद्ध
भस्म हुआ जाता हूँ मैं भी कुछ ऐसे ही
धीरे-धीरे आता हूँ दु:ख से बाहर.
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