डॉ0 हरि नाथ मिश्र
पूर्व विभागाध्यक्ष-अँगरेजी,
का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अयोध्या, (उ0प्र0)
(नया अध्याय, देहरादून)
सवैया(दुर्मिल)
जबसे प्रभु राम गए वन में, लगती नगरी सगरी उजड़ी।
सबसे मिलते सब लोग भले, पर बात लगे बिगड़ी-बिगड़ी।
तन को झट छोड़ चले नृप भी, यह पीर उठी मन में तगड़ी।
तड़पें-बिलखें जल की लहरें, सरिता सरयू उमड़ी-उमड़ी
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वन में सिय को हर घोर किया, अपराध पिशाच दशानन ने।
वध रावण बाद सुधार किया, खल-देश विभीष सुशासन ने।
छल को पुनि लील लिया झट से, सच के शुचि सुंदर आनन ने।
जनजीवन को नव मूल्य दिया, प्रभु-वास सुवास सुकानन ने।।







