राम मंदिर के दान में चोरी…खंड-खंड होता पाखंड

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विवेकानंद

 

 

             (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

राम मंदिर के दान में चोरी…खंड-खंड होता पाखंड

 

 

कुछ घटनाएं गहरे दर्द और निराशा से भर देती हैं। रामलला के दान की चोरी ऐसी ही घटना है। जिस राम मंदिर के लिए सनातनियों ने 500 साल इंतजार किया उसे बने हुए 50 महीने भी नहीं बीते कि दान में करोड़ों रुपए की हेराफेरी हो गई। जिन पर आरोप लगा वे खुद को रामलला का सेवक बताते हैं। कुछ जगहों से जानकारी आ रही है कि ट्रस्ट के कर्मचारी रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू के घर से सोना मिला है। टिन्नू राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के करीबी हैं। एक जानकारी यह है कि टिन्नू पहले चंपत राय के ड्राइवर थे। उन्हें मंदिर का कामकाज देखने के लिए नियुक्त किया गया। जब से उन्होंने काम संभाला करोड़पति हो गए। मंदिर निर्माण के प्रभारी गोपाल राव के रिश्ते में भतीजे लगने वाले सोमेश आनंद भी शक के घेरे में हैं। ऐसे कई नाम संदेह के दायरे में हैं।

हिन्दुओं की प्रबल आस्था के केंद्र में चोरी जैसा पाप तो बड़ा सवाल है ही, इससे बड़ा प्रश्न है कि चोरी करने वालों या करवाने वालों में इतना दुस्साहस आया कहां से? इन्हें कहां से यह अनुभव मिला कि सब कुछ होता जाएगा और कोई बाल भी बांका नहीं कर पाएगा? उनका यह अनुभव गलत होता नहीं दिख रहा है, क्योंकि चोरी की तीन-तीन शिकायत हो चुकी हैं, एसआईटी जांच कर रही है, शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच चुकी है, अब तक 5 लोगों- लवकुश, अवनीश, अनुकल्प, करुणे और रामशंकर के नाम सामने आए हैं, इनकी निशानदेही पर 2 करोड़ रुपए की रिकवरी होने की भी खबर है। लवकुश और अनुकल्प पुलिस हिरासत में हैं लेकिन मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की गई। ट्रस्ट से लेकर पुलिस और सरकार सबने मौन साध रखा है।

देश भर में सनातन का जयघोष है, धर्म की रक्षा का आह्वान है, हिन्दुत्व का ओज है, श्रद्धालुओं को त्याग और तप का ज्ञान दिया जा रहा है, दूसरी ओर आस्था के साथ घात किया जा रहा है? जो दिन-रात भगवान राम का नाम लेकर अपने राजनीतिक और सामाजिक उल्लू सीधे करते रहते हैं, उनके मुंह सिले हुए हैं। सख्त चेतावनियां गायब हैं। यह घटनाक्रम इस बात की पुष्टि करता है कि कुछ लोगों के लिए भगवान राम का आस्था से अधिक महत्व राजनीतिक है।

भक्तों से विश्वासघात का यह पहला पाप नहीं है। आंध्रप्रदेश के तिरुपति बालाजी के प्रसाद के लड्डुओं में चर्बी का मामला सामने आया था। कुछ स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले थे। बाद में विशेष जांच दल की रिपोर्ट में कहा गया कि मिलावट में सस्ते वनस्पति तेल और सिंथेटिक रसायन शामिल थे, जिससे असली देसी घी की नकल की जाती थी। मामला पाप और अधर्म के आरोपों से गुजरते हुए भ्रष्टाचार पर समाप्त हुआ।

धर्म को जिस बेरहमी से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है वह अभूतपूर्व है। मंदिरों में आस्था से ज्यादा कमाई पर फोकस है। धर्म के तथाकथित रक्षकों ने भगवान को गरीब-अमीर में बांट दिया है। उत्तर से दक्षिण तक विश्वविख्यात मंदिरों में दर्शनों के लिए टिकट की व्यवस्था है। अमीर आदमी को भगवान जल्दी दर्शन देता है, आम आदमी घंटों कतार में खड़ा रहता है। हाल ही में यह मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा है। विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी पी. चोक्कलिंगम ने एक याचिका लगाई है जिसमें मंदिरों में विशेष टिकट, ब्रेक दर्शन और वीआईपी दर्शन जैसी व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए हैं। चोक्कलिंगम का तर्क है कि सनातन परंपरा में अमीर और गरीब के बीच किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए पैसे के आधार पर भगवान के दर्शन की अलग व्यवस्था संविधान और धार्मिक मूल्यों दोनों के विपरीत है। यह व्यवस्था खत्म होनी चाहिए। हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में वीआईपी दर्शन व्यवस्था को लेकर याचिकाएं आई हैं। अदालत ने माना भी कि धार्मिक स्थलों पर विशेष सुविधाएं आदर्श स्थिति नहीं हैं, पर राज्यों को नीति बनाने का अधिकार देते हुए, कोई बड़ा आदेश इसे रोकने के लिए नहीं दिया था। मजेदार बात यह है कि जो सरकारें खुद को धार्मिक बताती हैं उन्होंने और जो खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती हैं उन्होंने भी भगवान के इस बंटवारे पर कोई कदम नहीं उठाया।

धर्म संवेदनशील विषय है। हिन्दू हों या मुस्लिम, अपने धर्म में अधिकांश श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आम आदमी की आस्था से खेलने में कई स्थानों पर कोई संकोच दिखाई नहीं देता। वक्फ की संपत्तियों के विवाद और मदरसों में पकड़ी जाने वाली अनुचित गतिविधियां इसका उदाहरण हैं। वक्फ के नाम पर अरबों रुपए की संपत्तियां मुस्लिम धर्म के ठेकेदारों ने दबा रखी हैं। इसके कई केस अदालतों में हैं। हर धर्म के कुछ प्रभावशाली लोग जिन्हें निर्विवाद रूप से सत्ता का संरक्षण भी प्राप्त होता है, जनता के साथ पाखंडपूर्ण राजनीति करते हैं।

अयोध्या का मामला विशेष इसलिए है क्योंकि इसके पीछे हजारों साल पुराना इतिहास भी है। रामलला की जन्म भूमि को मुक्त कराने के लिए अपने प्राण अर्पण करने वालों के नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है। आम हिन्दुओं की आस्था रामलला में है जाहिर है उन्हें इस घटना पर अफसोस भी है। अब सरकार के लिए चुनौती है कि कार्रवाई में मामला रफादफा करने जैसे संदेह की गुंजाईश न बचने पाए।   (विनायक फीचर्स)

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