प्रकृति बचेगी जब इंसान अज्ञानता से जागे

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सौजन्यः अशोक कुमार

कुश कुमार साहू 

मोपर भाटापारा

बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)

 

 

              (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

प्रकृति बचेगी जब इंसान अज्ञानता से जागे

 

हिरण पुछे बताओ भाई तोता।

क्या मानव-जीवन है उत्तम होता?

मानवता के बारे में हमे बताओ।

अच्छा-बुरा सभी बात समझाओ।।

तुम्हे मनुष्यों का अच्छा पहचान है।

क्या होते मासूम या होते शैतान है?

मधुर वाणी से सबको मित्र बनाते हो।

उनके बीच अक्सर आते-जाते हो।।

मैं जंगल झाड़ी का रहने वाला।

घूम फिर कर चारा चरने वाला।।

मैं मनुष्यों से बहुत डरता हूँ।

उनसे जरा दूरी बनाकर चरता हूँ।।

हुई थी भेंट जब गिरगिट से, तो मुझे थोड़ा कुछ बताया था।

बचके रहना मानव से कह कर, जाने क्यों मुझे समझाया था।।

बोले- प्रकृति अनुसार रंग बदलना, मेरा तो जन्मजात काम है।

पर कभी भी रंग बदल दे, यही मनुष्यों की असल पहचान है।।

न मौसम से न प्रकृति से ढलते हैं, वे तो पैसा देख अपने रंग बदलते हैं।

झूठे, मक्कार, बदमाशों के पीछे, चापलूस बनकर नित चलते हैं।। 

आगे बैठा था एक गिद्ध बेचारा।

जिसने मुझको किया इशारा।।

उसने अपनी एक स्वभाव बताई।

कभी जिंदा मांस नहीं खाई।।

पर देखा हमने ऐसा निर्दयी मानव।

जिसे हम कह सकते है दानव।।

ईश्वर की आड़ में बकरा काटे।

परिजनों के बीच मांस बांटे।।

खुश होते हैं दूसरे के घाव से, मांस खाते हैं बड़े ही चाव से।।

मन में आज दया न धरम है।

पशु जैसा इनका दुष्ट करम है।।

फिर हुई भेंट जब स्वान से।

उसने समझाया गर्वित मुस्कान से।।

मैं बस इंतजार में दुम हिलाता हूँ।

कोई दे तभी रुखी सुखी खाता हूँ।।

चंद सिक्कों के लिए लड़ता है इंसान।

जिसे देख शर्म करता है शैतान।।

पद हेतु दूसरों का तलवा चाटता है।

समय देख गर्दन भी काटता है।।

हम तो पशु हैं हमने नहीं है ज्ञान।

हमसे पशुता में तो आगे है इंसान।।

इंसान को इंसान कहने में है लाज।

मांस खाते देख शर्म से डूब मरे बाज।।

मुँह लटकाए बैठा हुआ था अजगर साँप।

मैने पूछा क्यों नाराज हो आप?

दुःखी मन से शिकायत करता है।

बस मांस खाने से मेरा पेट भरता है।।

देख इंसान की उदर मुझे नहीं जचा।

जंगल जमीन और नदी कुछ न बचा।।

जानें और क्या-क्या खा जाएगा।

क्या प्राणियों के लिए बहुमत बचाएगा?

यही सोंच के आज उदास है मेरा मन।

देख उनकी हैवानियत काँप रहा है तन।।

आज इंसान जानवरों से है बहुत आगे।

प्रकृति बचेगा जब इंसान अज्ञानता से जागे।।

हिरण की बात से तोता थोड़ा मुस्काया।

मनुष्यों की वास्तविकता हिरण को बताया।।

कुछ ज्ञानी है जो सब को ज्ञान सीखाते हैं।

ध्यानी है जो जग को सन्मार्ग दिखाते हैं।।

तो दुष्ट लोग जन-जन को दुःख पहुँचाते हैं।

कुछ चारों दिशाओं में हाहाकार मचाते हैं।।

गुण-अवगुण दोनों इंसानों में है होता।

एक जगे तो दूसरा विचार है सोता।।

मनुष्यों को मैं पूरा समझ नहीं पाया।

उनमें अच्छा बुरा दोनों गुण है समाया।।

बच के चलो इंसानो से है बड़ा नमकहराम।

दूर से करता हूँ मैं इनको तो राम-राम।।

 

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