राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
‘उम्मीद’
(कहानी)
“जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है” यह सिर्फ एक मशहूर गीत की पंक्ति नहीं है, बल्कि जीवन का वह परम सत्य है जहाँ दो आत्माएं सुख-दुख, उतार-चढ़ाव और वक्त के थपेड़ों को सहते हुए एक-दूसरे का संबल बनती हैं। समय के दो किनारे कैसे होते हैं? पहाड़ों की तलहटी में बसे एक छोटे से शांत शहर में दो लोग रहते थे माधव और अंजलि। माधव पेशे से एक लेखक था, जिसकी दुनिया पन्नों पर बिखरी स्याही और अधूरी कल्पनाओं के इर्द-गिर्द सिमटी थी। वहीं अंजलि शहर के एक छोटे से स्कूल में संगीत सिखाती थी। दोनों का स्वभाव नदी के दो किनारों जैसा था एक शांत और ठहरा हुआ, तो दूसरी में संगीत सी जीवंतता और बहाव।
दोनों की शादी जीवन के एक साधारण मोड़ पर हुई। शुरुआती साल किसी खूबसूरत राग की तरह बीते। माधव लिखते समय गुनगुनाता और अंजलि हारमोनियम पर उसकी धुनों को सुर देती। लेकिन जीवन हमेशा एक समान गति से नहीं चलता। ‘कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है’ यह नियम जल्द ही उनके सामने आने वाला था।
शादी के पाँच साल बाद, जब दोनों अपने जीवन में एक नए मेहमान की उम्मीद कर रहे थे तभी एक एक्सीडेंट में अंजलि ने न सिर्फ अपनी संतान को खो दिया, बल्कि डॉक्टरों ने कहा कि वह अब कभी माँ नहीं बन पाएगी। इस हादसे ने अंजलि के भीतर के संगीत को खामोश कर दिया। वह एक गहरे अवसाद (डिप्रेशन) में चली गई। उसने हारमोनियम को छूना बंद कर दिया और खुद को एक कमरे में कैद कर लिया।
माधव के लिए यह परीक्षा की घड़ी थी। उसका खुद का दिल भी टूटा था, लेकिन वह जानता था कि ‘तू धार है नदिया की, मैं तेरा किनारा हूँ।’ उसने हार नहीं मानी। माधव ने अपनी किताबें लिखना छोड़ दिया और अपना पूरा समय अंजलि को वापस जिंदगी में लाने के लिए समर्पित कर दिया।
वह हर रोज अंजलि के पास बैठता, गुजरे दिनों की बातें करता, उसे हंसाने की कोशिश करता। महीनों की खामोशी के बाद, एक शाम माधव ने धूल जम चुके हारमोनियम को साफ किया और अंजलि के सामने लाकर रख दिया। उसने अंजलि का हाथ पकड़कर चाबियों पर रखा और धीमे से कहा, “अंजलि, जो बीत गया वो दौर तो वापस नहीं आएगा, लेकिन इस दिल में तुम्हारे सिवा कोई और भी नहीं आ सकता। दो पल के इस जीवन से हमें मिलकर एक नई उम्र चुरानी है।”
माधव की आँखों में आंसू और अटूट प्रेम देखकर अंजलि का बांध टूट गया। वह माधव के सीने से लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी। उस रात उसके आंसुओं के साथ सारा दर्द बह गया। उसने कांपते हाथों से हारमोनियम पर उंगलियां फेरीं और कमरे में एक धीमी सी धुन गूंज उठी।
वक्त बदला, दोनों ने एक अनाथ आश्रम से एक छोटी सी बच्ची को गोद लिया, जिसका नाम उन्होंने ‘उम्मीद’ रखा, घर में फिर से किलकारियां गूंजीं और संगीत लौट आया। सालों बाद, जब माधव और अंजलि के बाल सफेद हो चुके थे, दोनों अपने घर के बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। सामने ‘उम्मीद’ अपनी धुन में गिटार बजा रही थी। माधव ने अंजलि का हाथ अपने हाथ में लिया। दोनों ने एक-दूसरे की झुर्रियों से भरे चेहरे को देखा, जिसमें दशकों का साझा संघर्ष, समझौता, आंसू और असीम प्रेम साफ़ झलक रहा था।
माधव मुस्कुराया और धीरे से बुदबुदाया, “जिंदगी और कुछ भी नहीं… तेरी मेरी कहानी है।”







