सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका / कवयित्री / शिक्षिका
गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख:
“अध्यापक अध्यापन से अधिक बच्चों में सीखने की जिज्ञासा जगाता है”
– सुश्री सरोज कंसारी
इस धरा पर जन्म लेने वाला हर मनुष्य शिक्षक है। कोरे मन में ज्ञान का सागर भरने का काम एक शिक्षक करता है।
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सद्व्यवहार से श्रेष्ठ मानव को गढ़ते,
अबोध मन में ज्ञान का सार हैं भरते।
गुरु दिव्य प्रकाशपुंज, अंधियारा हरते,
मझधारों से पार जीवन-नैया करते।।
जीवन की किताब में हर पग पर नए अध्याय प्रारंभ होते हैं। सवालों की अनंत बौछार से अंतर्मन भी भीग जाता है। हर पल नई चुनौतियों का सामना होता है, जिसका कोई पाठ्यक्रम नहीं होता। पर संघर्ष के पथ पर चलकर ठोकरों व मुसीबतों से सब आसान होने लगता है। समस्याओं के बीज में ही समाधान की फसल लहलहाने लगती है। अनुभव बंजर मन को भी उपजाऊ बना देती है। सबसे शक्तिशाली समय है जो हमें पल-पल प्रेरित करता है – चेहरे की वेदना को पढ़ने, दर्द को सहने, जख्मों को छुपाने, रिश्तों को निभाने और अपनी धुन में आगे बढ़ने के लिए, ईश्वर के आगे नतमस्तक होने और सत्कार्य करने के लिए। जन्म से लेकर मृत्यु तक हम सृष्टि के हर कण से हर पल सीखते हैं। जन्म होते ही बच्चे का परिचय माँ से होता है जो बिल्कुल अबोध है। फिर भी माँ की ममता, स्पर्श, प्रेम, दुलार और स्नेह को पहचानने में वह समर्थ होता है। इसलिए कहते हैं माँ ही सबसे प्रथम गुरु होती है। बालक माँ की गोद से उठकर परिवार के अन्य सदस्यों के सानिध्य में आता है। दादा-दादी, बुआ, चाचा-चाची, भाई-बहन को पहचानने लगता है। जहाँ वह हँसना-रोना, उठना-बैठना, उँगली पकड़कर चलना सीखता है। इसलिए परिवार ही उसकी प्रथम पाठशाला होता है।
कोरे मन में ज्ञान का सागर भरने का काम एक शिक्षक करता है। यहीं से इस दुनिया से धीरे-धीरे परिचय का सिलसिला प्रारंभ होता है। शिक्षक अज्ञान के अंधकार में एक उम्मीद की जुगनू बनकर चमकता है, जिसके सानिध्य में शिष्य का विद्यारंभ संस्कार प्रारंभ होता है। शिक्षक का अर्थ होता है – अपने आचरण से पथ प्रदर्शन करना, जीवन में आगे बढ़ने के लिए रास्ता बताना, मंजिल तक पहुँचने में मदद करना, एक बालक को परिवार, समाज व राष्ट्र के हित में कार्य करने के लिए तैयार करना। शिक्षक का कार्य सिर्फ पाठ्य-पुस्तक को पढ़ाकर उसे पास कराना नहीं होता। एक शिक्षक का महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है – बालक का चारित्रिक विकास करना, संस्कार देकर उसे देशभक्त, सेवाभावी, आज्ञाकारी और सद्व्यवहारी बनाना। जो सिर्फ व्यावसायिक ज्ञान नहीं, आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर पूरे संसार को रोशन कर सके। जो वीर, साहसी, निर्भीक और सहयोगी हो। अगर हम ऐसा करने में सफल होते हैं तो शिक्षक बनने की सार्थकता पूर्ण होती है।
आज आवश्यक है – दूषित मानसिकता से ऊपर उठकर हर बालक आरुणी, एकलव्य, राम, कृष्ण, गौतम, विवेकानंद बने। यह तभी संभव है जब आज के शिक्षक भी गुरु द्रोणाचार्य, सांदीपनि, रामकृष्ण परमहंस बनकर शिक्षा देने को तैयार हों जाएँ। जब राह कठिन हो, मन विचलित हो, उम्मीद की किरण दिखाई न दे, ऐसे समय में शिक्षक ज्ञान की रोशनी से हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। हर पग पर हमें उचित-अनुचित का निर्णय देने में सहयोग करते हैं। उनकी बात का अनुसरण कर एक योग्य नागरिक बन, जिम्मेदारी का निर्वहन करने में सक्षम होते हैं। बड़े-बड़े महापुरुष भी गुरु के आशीर्वाद व उनकी छत्रछाया में महान कार्य को अंजाम दिए हैं। गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण ही अनजान सफर में सहयोगी बनते हैं। उनकी आज्ञा पालन से ही हर कार्य सफल होता है। शिक्षक एक सफल नाविक है, जो हमें जीवन की मझधारों से साहिल तक पहुँचाने का कार्य करता है। शिष्य के हर कुविचारों को दूर कर सद्भाव भरते हैं। अपने श्रेष्ठ उद्गारों से उच्च कोटि के गुण विकसित करते हैं।
प्राचीन और वर्तमान शिक्षा, शिक्षक और शिष्य के संबंध में बहुत अंतर आया है। जो समय, परिस्थिति व माहौल का ही प्रभाव है। आधुनिक जीवनशैली का परिणाम है। पहले शिष्य गुरु के आज्ञाकारी होते थे, अनेक कष्ट उठाकर शिक्षा ग्रहण करते और सीखने की प्रबल भावना थी। मुश्किलों से डरते नहीं थे, व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करते, उनका उद्देश्य महान लक्ष्य तक पहुँचना होता था। पूर्ण लगन और मेहनत से पढ़ते थे, कोई सुविधा नहीं, अभाव में जीवन यापन करते और हकीकत की दुनिया में जीते थे। आज की परिस्थिति अलग है, गुरु-शिष्य परंपरा विलुप्त-सी हो गई है। पूर्ण सुविधा होने के बावजूद आज बच्चे वर्तमान जीवनशैली, पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण कर अपनी संस्कृति को भूल रहे हैं। शिक्षक के प्रति न श्रद्धा है न सम्मान। आज शिक्षा का उद्देश्य पूरी तरह से व्यावसायिक हो गया है। पढ़-लिखकर नौकरी ही उद्देश्य रह गया है। दूषित शिक्षा प्रणाली के लिए सिर्फ बच्चे ही नहीं, कुछ मनमौजी शिक्षक, अभिभावक और बोझिल पाठ्यक्रम ये सब जिम्मेदार हैं। आज जरूरत है सभी को मिलकर विद्यार्थियों को एक सूत्र में बाँधकर प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए गुरु-शिष्य के मधुर संबंधों को कायम रखने की, उनमें नैतिक, मानसिक और शारीरिक विकास कर सर्वांगीण विकास करने की। शिक्षक बनकर अपने दायित्व को ईमानदारी से पूर्ण करें। सिर्फ खानापूर्ति न करें। नवाचार के माध्यम से शिक्षा दें और इस पुनीत कार्य में हम सभी सहभागी बने।
असमंजस में निष्पक्ष न्याय कर लेते,
ब्रह्मा, विष्णु और महेश तब कहलाते।
धरा के धीरज से उच्च शिखर पहुंचाते,
हे ! गुरुवर हृदय से नमन तुम्हें करते।
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